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सरकार का अंग – व्यवस्थापिका का संगठन

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इस आर्टिकल में सरकार का अंग व्यवस्थापिका क्या है, व्यवस्थापिका का संगठन, द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण एवं दोष आदि के बारे में चर्चा की गई है।

व्यवस्थापिका क्या है?

सरकार के अंगों में व्यवस्थापिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कानून निर्माण का कार्य करने वाली संस्था को व्यवस्थापिका कहते हैं। व्यवस्थापिका उन कानूनों का निर्माण करती है जिनके आधार पर कार्यपालिका शासन करती है और न्यायपालिका न्याय प्रदान करने का कार्य करती है।

इस प्रकार व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्य के लिए आवश्यक आधार प्रदान करती है। व्यवस्थापिका केवल कानूनों का ही निर्माण नहीं करती, वरन् प्रशासन की नीति भी निश्चित करती है।

संसदात्मक शासन व्यवस्था में तो कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण भी रखती है। संविधान में संशोधन का कार्य व्यवस्थापिका के द्वारा ही किया जाता है। अतः कहा जा सकता है कि व्यवस्थापिका सरकार के दूसरे अंगों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण स्थिति रखता है।

व्यवस्थापिका का संगठन

व्यवस्थापिका वाद-विवाद का सबसे लोकतांत्रिक और खुला मंच है। इसलिए इसे जनता का रंगमंच भी कहा जाता है। अपनी संरचनात्मक विशेषता के कारण यह सरकार के अन्य सभी अंगों में सबसे ज्यादा प्रतिनिधिक है और फिर इसके पास सरकार यानी कार्यपालिका का चयन करने और उसे बर्खास्त करने की शक्ति भी है।

व्यवस्थापिका का संगठन दो रूपों में किया जाता है। व्यवस्थापिका का या तो एक सदन हो सकता है या दो सदन। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के प्रारंभ में अधिकांश देशों में एक सदनात्मक व्यवस्थापिका ही थी किंतु बाद में यह अनुभव किया गया कि प्रथम सदन की शक्ति पर अंकुश रखने और प्रथम सदन द्वारा किए गए कार्यों पर पुनर्विचार के लिए व्यवस्थापिका के दो सदन होनी चाहिए।

वर्तमान समय में कुछ छोटे देशों को छोड़कर सभी महत्वपूर्ण देशों में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिकाएं विद्यमान है।

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका में पहले सदन को निम्न सदन या लोकप्रिय सदन तथा दूसरे सदन को उच्च सदन या ऊपरी सदन कहा जाता है। प्राय: सभी देशों में निम्न सदन जनता का प्रतिनिधित्व करता है। अतः इसके सदस्यों का चुनाव देश की जनता द्वारा व्यस्क मताधिकार के आधार पर गुप्त मतदान द्वारा किया जाता है। द्वितिय सदन (उच्च सदन) विशिष्ट वर्गों तथा संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्यों के चुनाव हेतु विभिन्न देशों में अलग-अलग विधि अपनाई गई है।

उदाहरण के लिए इंग्लैंड की लार्ड सभा के सदस्य तथा जापान, कनाडा, इटली में द्वितीय सदन के सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं। अमेरिका में सीनेट के सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन किया जाता है तथा भारत में राज्यसभा के अधिकांश सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित तथा कुछ सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत जाते हैं।

एक सदनात्मक व्यवस्थापिका वाले देश

एक सदनीय व्यवस्थापिका में एक ही सदन होता है। यह सदन प्राय: प्रतिनिधि सदन कहलाता है। लोकतांत्रिक देशों में इस सदन के सदस्यों को जनता प्रत्यक्ष रूप से चुनती है। इसे प्रथम सदन, लोकप्रिय सदन अथवा निम्न सदन कहा जाता है।

पुर्तगाल, इजरायल, चीन (जनपीपुल्स कांग्रेस), यूनान व भारतीय संघ की कुछ इकाइयों में एक सदनीय विधान मंडल की व्यवस्था है। जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार एक सदन ‘निरंकुश और अहंकारी‘ होता है।

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका वाले देश

द्विसदनीय व्यवस्थापिका में दो सदन होते हैं। द्विसदनीय विधानमंडल की प्रथा सर्वप्रथम ब्रिटेन (संसदो की जननी) में प्रचलित हुई। ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत, रूस, जर्मनी आदि देशों में द्विसदनीय व्यवस्थापिका है।

द्वितीय सदन सामान्यतः समाज के विभिन्न वर्गों, हितों या संघ की ईकाइयों का प्रतिनिधित्व करता है।

व्यवस्थापिका एक सदनात्मक होनी चाहिए या द्विसदनात्मक यह प्रश्न पर्याप्त विवादा ग्रस्त रहा है। हम यहां द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष और विपक्ष में तर्क के बारे में चर्चा करेंगे।

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिकाओं के नाम :

जापान1. प्रतिनिधि सदन
2. सभासद (पार्षद) सदन (सरकार द्वारा मनोनीत)
ब्रिटेन1. हाउस ऑफ कॉमन्स
2. हाउस ऑफ लार्ड्स (उच्च सदन)
स्विट्जरलैंड1. राष्ट्रीय सभा
2. राज्य परिषद
फ्रांस1. राष्ट्रीय सभा
2. सिनेट
रूस1. ड्यूमा
2. राष्ट्रीय सोवियत
भारत1. लोकसभा
2. राज्य सभा
अमेरिका1. प्रतिनिधि सभा
2. सीनेट
जर्मनी1. हाउस ऑफ कॉमन्स
2. हाउस ऑफ लार्ड्स (उच्च सदन)

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण एवं दोष

Merits and Demerits of bicameral Legislature :

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के गुण

(1) प्रथम सदन की मनमानी पर रोक

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि शक्ति भ्रष्ट करती है और बिना किसी प्रतिबंध के दिव्य शक्ति मनुष्य को नितांत भ्रष्ट कर देती है व्यवस्थापिका अत्याचारी भ्रष्ट एवं स्वेच्छाचारी नया हो पाए इसके लिए दो सदन होना आवश्यक है डॉ. गार्नर के शब्दों में इस प्रकार द्वितीय सदन की विद्यमानता स्वतंत्रता की गारंटी पर कुछ सीमा तक अत्याचार से सुरक्षा भी है।

(2) अविचारपूर्ण कानून निर्माण पर रोक

दूसरा सदन पहले सदन की जल्दबाजी और कुविचारपूर्ण कानूनों पर रोक लगाने का सर्वाधिक प्रभावशाली साधन है। दूसरे सदन की उपयोगिता बताते हुए ब्लण्टशली ने कहा है कि, “दो आंखों की अपेक्षा चार आंखे सदा अच्छा देखती है। विशेषत: जब किसी प्रश्न पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार करना आवश्यक हो।”

(3) सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व

प्रथम सदन में शक्तिशाली राजनीतिक दलों से संबंधित एवं मध्यम वर्ग के सदस्यों को ही प्रतिनिधित्व प्राप्त हो पाता है। लेकिन लोकतंत्र का आदर्श सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। दूसरे सदन में विशेष वर्गों, अल्पसंख्यकों एवं विद्या, ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से योग्य व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखा जा सकता है। इस प्रकार प्रतिनिधित्व की दृष्टि से दो सदनों की व्यवस्था की जाती है।

(4) कार्य विभाजन से लाभ

जन कल्याणकारी राज्य को अपना लेने के कारण वर्तमान समय में व्यवस्थापिका के अंतर्गत कार्य बहुत बढ़ गए हैं। व्यवस्थापिका के दो सदन होने पर इस बढ़े हुए कार्य का विभाजन किया जा सकता है और इससे व्यवस्थापिका की कार्य क्षमता बढ़ जाती है।

(5) जनमत निर्माण में सहायक

विधेयक के निम्न सदन में पास हो जाने के बाद उच्च सदन में पास होने में समय लगता है। इस प्रकार उच्च सदन में विधेयक पास करने से पूर्व जनता को विधेयक के बारे में सोचने विचारने के लिए समय देता है और सामान्य जनता, राजनीतिक दल एवं प्रेस इस प्रस्तावित विधेयक पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।

(6) स्वतंत्रता की रक्षा का साधन

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका नीतियों में संतुलन स्थापित करती है एवं अल्पसंख्यकों की रक्षा करती है। लॉर्ड एक्टन ने दूसरे सदन को स्वतंत्रता की रक्षा का सबसे प्रमुख साधन माना है।

(7) कार्यपालिका की स्वतंत्रता में वृद्धि

गैटिल का कथन है कि, “दो सदन एक दूसरे पर रुकावट का कार्य करके कार्यपालिका को अधिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं और अंत में इससे लोकहित की बढ़ोतरी होती है।

(8) अनुभवी लोगों का सदन

यदि इंग्लैंड, अमेरिका, भारत, कनाडा आदि देशों के उच्च सदन पर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट होता है कि इन देशों के उच्च सदनों के सदस्य राजनीतिक दृष्टि से बहुत अधिक अनुभवी होते हैं। ये अनुभवी व्यक्ति राजनीति में परिपक्वता, गंभीरता और आवश्यक अनुदारता का प्रवेश कराते हैं तथा देश को अपने अनुभव से लाभान्वित करते हैं।

(9) संघ राज्य के लिए उपयुक्त

एक संघ राज्य में जो विभिन्न इकाइयों होती है उनमें क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत अधिक अंतर होता है। ऐसी परिस्थिति में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के द्वारा प्रथम सदन में जनसंख्या के आधार पर और दूसरे सदन में इकाइयों की समानता के आधार पर प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाता है। इस प्रकार संघ की सभी इकाइयों को संतुष्ट रखा जा सकता है और छोटी इकाइयों के हितों की रक्षा संभव होती है।

अमेरिका के द्वितीय सदन (सीनेट) में प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह सभी राज्यों में समानता स्थापित करता है। वहीं भारत में ज़्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्रों को ज़्यादा और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों को कम प्रतिनिधित्व के आधार पर संविधान की चौथी अनुसूची के अनुसार संख्या निर्धारित कर दी गई है।

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका के दोष

(1) द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका अलोकतंत्रात्मक

ऐसा माना जाता है कि प्रभुसत्ता अविभाज्य होती है और लोकतंत्र का यह आधारभूत सिद्धांत है कि प्रभुसत्ता जनसाधारण में निवास करती है। इसलिए यह कहा जाता है कि सर्वसाधारण जनता द्वारा निर्वाचित सदस्य सर्वसाधारण की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सकता है और दूसरा सदन अलोकतंत्रीय होता है।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक एबे सीज कहते हैं कि, “यदि दूसरा सदन पहले सदन का विरोध करता है तो दुष्ट है और यदि सहमत हो जाता है तो व्यर्थ है।”

(2) रूढ़िवादिता का गढ़

क्योंकि द्वितीय सदन के सदस्य आयु में अपेक्षाकृत बड़े होते हैं और उनके द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन, मनोनयन या उत्तराधिकार के आधार पर अपना पद प्राप्त किया जाता है। इसलिए वह रूढ़िवादिता का गढ़ बन जाता है और देश में प्रगतिशील सुधार करने के इच्छुक प्रथम सदन के मार्ग में रुकावट डालता है।

(3) अपव्यय

द्विसदनीय प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक विधेयक पर दो-दो बार विचार होता है जिसका अर्थ है कि समय की क्षति और राजकोष पर अनावश्यक बोझ। जब एक सदन द्वारा ही व्यवस्थापन कार्य संपन्न हो सकता है तो दूसरे सदन का अस्तित्व स्पष्टत: ही धन का अपव्यय है।

(4) संगठन की समस्या

दूसरे सदन का इस कारण भी विरोध किया जाता है कि द्वितीय सदन के गठन की पद्धति के विषय में कोई भी एकमत नहीं है और गठन की पद्धति के संबंध में असहमति स्वत: ही इसके विरुद्ध एक तर्क है। व्यवहार में दो सदनों की व्यवस्था वाले सभी देशों में यह समस्या उत्पन्न हुई है।

उदाहरण के लिए इंग्लैंड के हाउस ऑफ लार्ड्स को सदैव असंगत कहा जाता है। क्योंकि यह कुलीन वर्ग को छोड़कर अन्य किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

कनाडा में उच्च सदन के सदस्यों को मनोनीत करने की पद्धति अपनाई गई है लेकिन इसके विरुद्ध भी गंभीर आपत्ति प्रकट की जाती है। अप्रत्यक्ष निर्वाचन कई बार भ्रष्टाचार का कारण बन जाता है। यदि प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर दूसरे सदन का गठन किया जाए तो वह पहले सदन का ही दूसरा रूप हो जाएगा।

(5) दोनों सदनों में संघर्ष की आशंका

ऐसा देखा गया है कि व्यवस्थापिका के दो सदन होने पर इन दोनों सदनों में लगभग सदैव भी गतिरोध बना रहता है, जिसका शासन व्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

अमेरिकी संविधान सभा के एक सदस्य बेंजामिन फ्रेंक्लिन का विचार है कि, “दो सदन रखना ठीक ऐसा ही है जैसे एक गाड़ी के दोनों तरफ घोड़े जोत दिए जाएं और वे विरोधी दिशा में जाने का प्रयत्न करें।”

(6) अल्प मतों को प्रतिनिधित्व देने हेतु अन्य संतोषजनक प्रबंध संभव

द्वितीय सदन के आलोचक कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए दूसरे सदन की व्यवस्था की जाए। अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए संविधान में दूसरे उपाय किए जा सकते हैं।

(7) संघ राज्य के लिए भी आवश्यक नहीं

आलोचकों का कथन है कि संघ राज्य के लिए भी दूसरे सदन का अस्तित्व न तो उपयोगी है और न ही आवश्यक। व्यवहार में देखा गया है कि दूसरे सदन के सदस्य इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने के बजाय उन राजनीतिक दलों का ही प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी सहायता से वे निर्वाचित होते हैं।

इसलिए लास्की ने कहा है कि, “यह गलत है कि संघ की रक्षा के लिए दूसरा सदन कोई प्रभावशाली गारंटी है।” संघ की इकाइयों के हितों की रक्षा वैधानिक सरंक्षण तथा स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा ही हो सकती है। दूसरे सदन के अस्तित्व द्वारा नहीं।

निष्कर्ष (conclusion) :

द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका की लोकप्रियता दो सदनों की व्यवस्थापिका कि इस प्रकार की आलोचनाओं के होते हुए भी वर्तमान समय में प्रतिनिधियात्मक लोकतंत्र के लिए द्विसदनात्मक विधानमंडल नितांत आवश्यक माना जाता है।

इसमें संदेह नहीं कि यदि द्वितीय सदन पूर्ण जागरूकता के साथ प्रथम सदन द्वारा पारित किए गए विधायकों पर पुनर्विचार करे तो लोकप्रिय सदन की जल्दबाजी और मनमानी पर उपयोगी एवं आवश्यक प्रतिबंध लग सकता है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व दिए जाने पर कानून निर्माण का कार्य अधिक पूर्णता के साथ किए जाने की आशा की जा सकती है।

यही कारण है कि केवल कुछ छोटे राज्यों को छोड़कर शेष सभी राज्यों में द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका पाई जाती है। इसके साथ ही द्वितीय सदन का अस्तित्व उसी समय उपयोगी हो सकता है, जबकि वह विधेयकों पर स्वतंत्र रूप से विचार करें। वर्तमान समय में इस बात को लगभग सभी व्यक्ति स्वीकार करते हैं कि द्वितीय सदन की शक्तियां लोकप्रिय सदन से कम होनी चाहिए। कानून निर्माण के संबंध में अंतिम निर्णय की शक्ति (निम्न सदन) के ही हाथों में रहनी चाहिए।

व्यवस्थापिका संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी

👉 ब्रिटेन में व्यवस्थापिका का उच्च सदन (हाउस ऑफ लार्ड्स) सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय का कार्य करता है।

👉 ब्रिटेन को संसदो की जननी कहा जाता है।

👉 ब्रिटेन में व्यवस्थापिका के उच्च सदन का गठन वंशानुगत आधार पर किया जाता है। उच्च सदन हाउस ऑफ लार्ड्स के सदस्यों को पीयर कहा जाता है।

👉 “ब्रिटेन की संसद सब कुछ कर सकती है, केवल स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री नहीं बना सकती है।” – डी लोमे

👉 ब्रिटेन में ‘छाया मंत्रिमंडल’ (Shadow Cabinet) का निर्माण किया जाता है।

👉 स्विस संघीय संसद में दोनों सदनों की समान शक्तियां हैं तथा विश्व की सर्वाधिक गंभीर रूप से कार्य करने वाली विधायिका है।

👉 अमेरिकी सीनेट विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली उच्च सदन है जिसे अमेरिकी संघीय व्यवस्था का मेरुदंड भी कहा जाता है। राष्ट्रपति सीनेट का पदेन सभापति होता है तथा सीनेट के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। सीनेट की कुल सदस्य संख्या 100 है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. संगठन की दृष्टि से व्यवस्थापिका के कितने प्रकार होते हैं?

    उत्तर : संगठन की दृष्टि से व्यवस्थापिका दो प्रकार की होती है : एक सदनीय व्यवस्थापिका और द्वि सदनीय व्यवस्थापिका।

  2. एक सदनात्मक व्यवस्थापिका वाले देश कौन-कौन से हैं?

    उत्तर : पुर्तगाल, इजरायल, चीन (जनपीपुल्स कांग्रेस), यूनान व भारतीय संघ की कुछ इकाइयों में एक सदनीय विधान मंडल की व्यवस्था है।

  3. द्वि सदनात्मक व्यवस्थापिका वाले देश कौन-कौन से हैं?

    उत्तर : ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत, रूस, जर्मनी आदि देशों में द्विसदनीय व्यवस्थापिका है।

  4. “ब्रिटेन की संसद सब कुछ कर सकती है, केवल स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री नहीं बना सकती है।” यह कथन किसका है?

    उत्तर : ब्रिटेन में संसद किसी भी कानून का निर्माण कर सकती है। उसे अवैधानिक घोषित करने वाला कोई नहीं है। इसी संदर्भ में डि लोमे ने कहा था कि ब्रिटिश संसद सब कुछ कर सकती है, केवल स्त्री को पुरुष और पुरुष को स्त्री नहीं बना सकती है।

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About Mahender Kumar

My Name is Mahender Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching compititive exams. My education qualification is B. A., B. Ed., M. A. (Political Science & Hindi).

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