लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय (अभिजन) सिद्धांत » Pratiyogita Today
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लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय (अभिजन) सिद्धांत

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इस आर्टिकल में लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय (अभिजन) सिद्धांत के बारे में तथा लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत की प्रमुख मान्यताएं और मूल्यांकन के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है।

लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत (Elitist Theory of Democracy in Hindi) : लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में विकसित हुआ। यह लोकतंत्र के उदारवादी सिद्धांत का ही विस्तार हैै। लोकतंत्र क्लासिक सिद्धांत को अव्यवहारिक मानते हुए अनुभववादी लेखकों ने लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत पेश किया।

इन अनुभववादी लेखकों में मुख्य रूप से पैरेटो, मोस्का (इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया), मिचेल, बर्नहम, शुंपीटर, माइकेल्स, सी. राइट मिल्स तथा हैराल्ड है इनके अनुसार लोकतंत्र अपने परंपरागत रुप अर्थात बहुमत के शासन के रूप में असंभव है।

पैरेटो और मोस्का के अनुसार किसी भी समाज या संगठन के अंतर्गत महत्वपूर्ण निर्णय केवल गिने-चुने लोग ही करते हैं चाहे उस संगठन का बाहरी स्वरूप कैसा भी क्यों न हो।

रॉबर्ट मिशेल्स ने ‘गुटतंत्र के लौह नियम’ (Iron Law of Oligarchy) की चर्चा करते हुए यह तर्क दिया कि अधिकांश मनुष्य स्वभाव से जड़, आलसी और दास मनोवृति वाले होते हैं जो अपना शासन स्वयं चलाने में समर्थ नहीं होते हैं। अतः नेतागण अपनी वाकपटुता की निपुणता के बल पर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करके सत्ता पर अधिकार जमा लेते हैं।

समाज में चाहे कोई भी शासन प्रणाली क्यों न अपनाई जाए वह अवश्य ही गुटतंत्र (Oligarchy) या गिने-चुने लोगों के शासन का रूप धारण कर लेती है।

लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि प्रत्येक शासन व्यवस्था में 2 वर्ग होते हैं शासक और शासित । शासक वर्ग हमेशा अल्पसंख्यक (अभिजन) होता है। राज्य की राजनीतिक सत्ता इसी में होती है। इसका मुख्य कारण इस वर्ग की नेतृत्व क्षमता है।

इस सिद्धांत के अनुसार जनता का व्यवहार हमेशा अतार्किक होता है, अतः जनता की सरकार एक कल्पना मात्र है। प्रभावशाली जनमत की अवधारणा अव्यवहारिक है तथा वह शासन में जनता की सहभागिता के विरुद्ध है। लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत के अनुसार नागरिक सहभागिता लोकतंत्र की आवश्यक शर्त नहीं है।

मूल रूप से विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत समाज विज्ञान के क्षेत्र में सामाजिक संगठन के भीतर मनुष्य किस प्रकार व्यवहार करते हैं, की व्याख्या देने के लिए विकसित किया गया था।

लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत की प्रमुख मान्यताएं

पैरेटो के अनुसार समाज के हर क्षेत्र में कुछ सबसे योग्य व्यक्ति होते हैं इन्हें विशिष्ट वर्ग कहा जाता है। अतः व्यक्ति में समानता नहीं बल्कि असमान शक्ति एवं योग्यता होती है।

मोस्का के अनुसार हर समाज में शासक तथा शासित वर्ग होते हैं। शासक संगठित तथा अल्पमत में होता है जबकि शासित असंगठित तथा बहुमत में होता है। अतः बहुमत पर अल्पमत का शासन चलता है।

रॉबर्ट मिशेल्स के अनुसार हर संगठन में ‘अल्पतंत्र का लौह नियम’ चलता है। उसके अनुसार सरकार केवल अल्पमत का संगठन है जो बहुमत पर शासन के लिए है। सक्रिय अल्पमत निष्क्रिय बहुमत पर शासन करता है।

जेम्स बर्नहम ने विशिष्ट वर्ग के सिद्धांत तथा मार्क्सवादी सिद्धांत दोनों को मिलाने का प्रयास किया है। उनके अनुसार वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था व्यक्तियों के एक छोटे से समूह द्वारा पुनः स्थापित की जाएगी जिन्हें प्रबंध कुशल विशिष्ट जन कहा जाएगा। उनके अनुसार यह प्रबंधकारी विशिष्ट जन उत्पाद पर नियंत्रण करता है।

मैनहाइम ने कहा है कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में जब समाज नीति निर्माण का कार्य विशिष्ट वर्ग को सौंप देता है तो वह लोकतंत्र से शून्य नहीं हो जाता। जनसाधारण निश्चित अंतराल के बाद वोट डालकर अपनी आकांक्षाएं प्रकट कर देते हैं। अपने मताधिकार के बल पर वे नेताओं को बहुमत के हित में निर्णय करने को विवश कर सकते हैं।

शुंपीटर ने तर्क दिया कि किसी भी शासन प्रणाली की पहचान उसकी संस्थाओं से की जाती है इसमें यह देखा जाता है कि वहां सर्वोच्च कानून एवं नीतियां बनाने वालों को कैसे नियुक्त किया जाता है और अपने पद से कैसे हटाया जाता है। इस दृष्टि से लोकतंत्रीय प्रणाली अन्य शासन प्रणालियों से अपनी अलग पहचान बनाती है।

लोकतंत्र में राजनीतिक निर्णय नेताओं के द्वारा लिए जाते हैं जनसाधारण के द्वारा नहीं। परंतु जनसाधारण के वोट प्राप्त करने के लिए वहां नेताओं में खुली प्रतिस्पर्धा होती है तथा इसमें राजनीतिक नेता असीम सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकते। लोकतंत्र में जनसाधारण को अपनी पसंद की नीतियां और कार्यक्रम चुनने का अवसर मिल जाता है, अन्य शासन प्रणालियों में ऐसा संभव नहीं होता।

आरों ने तर्क दिया है कि लोकतंत्र तथा अन्य शासन प्रणालियों के विशिष्ट वर्गों में बुनियादी अंतर पाया जाता है। सोवियत प्रणाली और लोकतंत्र में अंतर करते हुए आरों ने लिखा जहां सोवियत किस्म के समाज में एक ही विशिष्ट वर्ग को शासन में एकाधिकार प्राप्त होता है।

उदार लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता। यहां विशिष्ट वर्ग की बहुलता तथा शासन में नियंत्रण एवं संतुलन की ऐसी व्यवस्था पाई जाती है जिससे यहां असीम सता का प्रयोग संभव नहीं होता।

सार्टोरी ने तर्क दिया कि लोकतंत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत विशिष्ट वर्ग एक विशेष भूमिका निभाते हैं। ये विशिष्ट वर्ग चुनाव के मैदान में उतरकर आपस में मुकाबला करते हैं। विशिष्ट वर्ग के अस्तित्व को लोकतंत्र की अपूर्णता नहीं मानना चाहिए क्योंकि जनसाधारण अपने आप शासन चलाने में समर्थ नहीं होते।

इसलिए शासन सचमुच सुयोग्य नेताओं का कार्य है। लोकतंत्र को असली खतरा नेतृत्व के अस्तित्व से नहीं बल्कि नेतृत्व के अभाव से है। यदि लोगों को सही नेतृत्व नहीं मिलेगा तो लोकतंत्र विरोधी विशिष्ट वर्ग उन्हें गुमराह कर देंगे।

लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत का मूल्यांकन

लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत के समर्थकों ने उदार लोकतंत्र के सिद्धांत को नया जीवन देने का प्रयत्न किया है। परंतु वे यह प्रमाणित नहीं कर पाए कि लोकतंत्र में स्वयं जनसाधारण को अपनी साधारण स्थिति से ऊपर उठने और सत्ता के स्थान पर पहुंचने का अवसर कैसे मिल सकता है।

यह सिद्धांत सफल लोकतंत्र के लिए नेताओं को अधिक महत्वपूर्ण मानता है जनता को नहीं। लोकतंत्र और विशिष्ट जनों में सहअस्तित्व संभव नहीं है क्योंकि सिद्धांत मनुष्य में समानता का विरोधी है तथा ऐसा असमानताओं को मूलभूत मानता है। यह सिद्धांत लोकतंत्र को जनसाधारण से दूर रखना चाहता है तथा रूढ़िवादी है।

सी.बी. मैक्फर्सन ने लिखा है कि विशिष्ट वर्गवादी सिद्धांत ने लोकतंत्र को मानवीय आकांक्षा के स्तर से नीचे गिरा कर बाजार संतुलन प्रणाली में बदल दिया है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया था?

    उत्तर : लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत का प्रतिपादन मुख्य रूप से पैरेटो, मोस्का (इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया), मिचेल, बर्नहम, शुंपीटर, माइकेल्स, सी. राइट मिल्स तथा हैराल्ड ने किया।

  2. ‘अल्पतंत्र के लौह नियम’ (Iron Law of Oligarchy) का सिद्धांत किसने दिया था?

    उत्तर : रॉबर्ट मिशेल्स ने ‘अल्पतंत्र के लौह नियम’ (Iron Law of Oligarchy) का सिद्धांत दिया।

  3. लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत के अनुसार लोकतंत्र की आवश्यक शर्त नहीं है?

    उत्तर : लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत के अनुसार नागरिक सहभागिता लोकतंत्र की आवश्यक शर्त नहीं है।

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About Mahender Kumar

My Name is Mahender Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching compititive exams. My education qualification is B. A., B. Ed., M. A. (Political Science & Hindi).

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